एंडी बर्नहैम पिछले दस वर्षों में ब्रिटेन के सातवें प्रधानमंत्री हैं और २०२४ में लेबर पार्टी की ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद इस पद पर पहुंचने वाले दूसरे नेता। उन्होंने ऐसे समय सत्ता संभाली है जब लेबर पार्टी कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। एक ओर नाइजेल फ़राज के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी लोकलुभावन पार्टी रिफॉर्म यूके लगातार अपना जनाधार बढ़ा रही है, तो दूसरी ओर लेबर के भीतर भी वैचारिक दिशा और संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना आसान नहीं रह गया है। इसके साथ-साथ ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था भी भारी राजकोषीय दबावों से गुजर रही है।
ऐसे में बर्नहैम का प्रधानमंत्री बनना केवल चेहरे का बदलाव नहीं है। उनका महत्व इस बात में है कि वे सत्ता में एक अलग राजनीतिक अनुभव और अलग प्रशासनिक दृष्टि लेकर आए हैं। हाल के अधिकांश ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों का राजनीतिक जीवन वेस्टमिंस्टर की राजनीति तक सीमित रहा, जबकि बर्नहैम ने पिछले लगभग एक दशक तक ग्रेटर मैनचेस्टर के मेट्रो मेयर के रूप में काम किया। इस भूमिका ने उन्हें स्थानीय प्रशासन, शहरी विकास और विकेंद्रीकृत शासन का व्यावहारिक अनुभव दिया है। यद्यपि ब्रिटेन की मौजूदा आर्थिक परिस्थितियाँ बड़े सुधारों की अनुमति नहीं देतीं, फिर भी शासन के प्रति उनका दृष्टिकोण ब्रिटिश राजनीति में कुछ नई प्राथमिकताएँ स्थापित कर सकता है।
डाउनिंग स्ट्रीट तक एक अलग सफर
बर्नहैम की राजनीतिक यात्रा पारंपरिक ब्रिटिश नेताओं से कुछ अलग रही है। वे २००१ में पहली बार संसद पहुँचे और टोनी ब्लेयर तथा गॉर्डन ब्राउन की सरकारों में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं। २००९ में वे स्वास्थ्य मंत्री बने। 2015 में उन्होंने लेबर पार्टी के नेतृत्व के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन जेरेमी कॉर्बिन से हार गए। बाद में उन्होंने कीयर स्टार्मर को चुनौती देने के बजाय राष्ट्रीय राजनीति से कुछ दूरी बनाई और २०१७ में ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर बन गए। यही चरण उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को सबसे अधिक आकार देने वाला साबित हुआ। उन्होंने स्थानीय निकायों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों, नागरिक समाज और सरकारी संस्थाओं को साथ लेकर क्षेत्रीय विकास का ऐसा मॉडल विकसित करने की कोशिश की, जिसने उन्हें केवल राजनेता नहीं बल्कि एक व्यावहारिक प्रशासक की पहचान भी दी।
क्षेत्रीय असमानता के विरुद्ध राजनीति
बर्नहैम की राजनीति का केंद्रीय विचार वर्षों से लगभग एक जैसा रहा है। उनका मानना है कि ब्रिटेन में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण लंदन में हो गया है, जिसके कारण देश के अन्य क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं और राष्ट्रीय उत्पादकता भी प्रभावित हुई है। वे लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि परिवहन, आवास, कौशल विकास और आर्थिक नियोजन जैसे विषयों पर शहरों और क्षेत्रों को अधिक अधिकार मिलने चाहिए। उनका उद्देश्य केवल राज्य की भूमिका बढ़ाना नहीं है, बल्कि शासन को स्थानीय जरूरतों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाना है। प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले भाषण में उन्होंने "पिछले चालीस वर्षों के सबसे बड़े बदलाव" का वादा किया। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि मार्गरेट थैचर के दौर में स्थापित उस केंद्रीकृत और बाजार-प्रधान आर्थिक मॉडल की आलोचना भी थी, जिसे बर्नहैम ब्रिटेन के औद्योगिक क्षेत्रों के पतन और क्षेत्रीय असमानताओं के लिए जिम्मेदार मानते हैं।
घरेलू एजेंडा: क्षेत्रीय विकास पर ज़ोर
बर्नहैम की घरेलू नीति का केंद्र क्षेत्रीय आर्थिक पुनर्निर्माण और प्रशासनिक सुधार होने की संभावना है। व्यापक आर्थिक नीतियों में वे शायद निरंतरता बनाए रखें, लेकिन सार्वजनिक सेवाओं, औद्योगिक नीति और क्षेत्रीय विकास में सरकार की भूमिका अधिक सक्रिय हो सकती है। वैचारिक रूप से वे लेबर पार्टी की सामाजिक-लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतिनिधि हैं। वे मजबूत सार्वजनिक सेवाओं, सामाजिक न्याय और सक्रिय सरकार के समर्थक रहे हैं। उनका मानना है कि सरकारी संस्थाएँ केवल जवाबदेह ही नहीं बल्कि प्रभावी और संवेदनशील भी होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री के रूप में वे ग्रेटर मैनचेस्टर के अपने अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास कर सकते हैं। इसके तहत शहरों और क्षेत्रीय प्रशासन को परिवहन, आवास, व्यावसायिक शिक्षा और आर्थिक नियोजन जैसे विषयों में अधिक अधिकार दिए जा सकते हैं। उनकी सोच तुलनात्मक प्रशासन के उन मॉडलों से भी प्रभावित है, जहाँ जर्मनी और नॉर्डिक देशों की तरह मजबूत क्षेत्रीय शासन व्यवस्था ने अपेक्षाकृत संतुलित विकास सुनिश्चित किया है। बर्नहैम का मानना है कि ब्रिटेन में भी सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को कम किए बिना क्षेत्रीय विषमताओं को दूर नहीं किया जा सकता।
आर्थिक मोर्चे पर उनकी सरकार घरेलू विनिर्माण को पुनर्जीवित करने के लिए ब्रिटिश उद्योगों के पक्ष में अधिक सक्रिय औद्योगिक नीति अपना सकती है। यह दृष्टिकोण स्टार्मर सरकार की अपेक्षाकृत बाजारोन्मुख नीतियों से अलग होगा। जल और ऊर्जा जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर भी सरकार की निगरानी बढ़ सकती है। हालांकि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में इन क्षेत्रों का पूर्ण राष्ट्रीयकरण व्यावहारिक नहीं दिखता। स्वास्थ्य और सामाजिक देखभाल भी उनकी प्राथमिकताओं में रहेंगे। संभव है कि वे २०१० में प्रस्तावित एस्टेट लेवी जैसी किसी संशोधित योजना को फिर से सामने लाएँ, ताकि राष्ट्रीय देखभाल व्यवस्था के लिए संसाधन जुटाए जा सकें और एनएचएस (राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा) पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सके।
विदेश नीति: दिशा वही, प्राथमिकताएं अलग
विदेश नीति के क्षेत्र में बर्नहैम की सोच अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि पिछले कई वर्षों से उनका अधिकांश राजनीतिक ध्यान क्षेत्रीय प्रशासन पर केंद्रित रहा है, जबकि उनके पूर्ववर्ती कीयर स्टार्मर ने व्यक्तिगत कूटनीति को विशेष महत्व दिया था। प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले संबोधन में भी बर्नहैम ने विदेश नीति पर बहुत कम बात की। उन्होंने केवल इतना कहा कि ब्रिटेन अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं का पूरी तरह पालन करेगा। बाद में विदेश मंत्री इवेट कूपर ने भी स्पष्ट किया कि यूक्रेन और नाटो के प्रति ब्रिटेन की नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होगा।
इससे संकेत मिलता है कि ब्रिटेन की मूल रणनीतिक दिशा में निरंतरता बनी रहेगी। फिर भी कूटनीतिक प्राथमिकताओं में कुछ बदलाव संभव हैं। यूरोपीय संघ के साथ आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग को और गहरा करने की उनकी सार्वजनिक वकालत यह बताती है कि वे यूरोप के साथ रिश्तों को अधिक महत्व देंगे, विशेषकर ऐसे समय में जब ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल के दौरान ब्रिटेन और अमेरिका के संबंध पहले जितने सहज नहीं रहे हैं।
चीन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अपेक्षाकृत व्यावहारिक दिखाई देता है। वे पहले भी हरित प्रौद्योगिकी और विनिर्माण जैसे विषयों पर चीनी प्रतिनिधियों के साथ संवाद कर चुके हैं। इसलिए संभावना है कि उनकी चीन नीति सुरक्षा चिंताओं के बजाय आर्थिक हितों से अधिक संचालित होगी। चूँकि ब्रिटेन की औद्योगिक रणनीति आज भी चीन में परिष्कृत होने वाले महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर है, इसलिए इस संतुलन को साधना उनकी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
महत्वाकांक्षाओं की वास्तविक सीमा
बर्नहैम सरकार की सफलता अंततः उनकी नीतियों से अधिक उन परिस्थितियों पर निर्भर करेगी जिनमें उन्हें काम करना है। सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। जी-7 देशों में ब्रिटेन की उधारी लागत सबसे अधिक है। उत्पादकता वृद्धि धीमी है, आबादी तेजी से वृद्ध हो रही है, स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा है और सार्वजनिक वित्त पहले से ही भारी दबाव में है। ऐसे में व्यापक कल्याणकारी योजनाओं या बड़े सुधार कार्यक्रमों के लिए संसाधन जुटाना आसान नहीं होगा।
आव्रजन भी उनके सामने एक कठिन राजनीतिक प्रश्न है। यह रिफॉर्म यूके का सबसे प्रभावी चुनावी मुद्दा बन चुका है, जबकि बर्नहैम अब तक इस विषय पर अपेक्षाकृत संयमित रहे हैं। यदि उनकी सरकार इस प्रश्न का प्रभावी समाधान नहीं खोज पाती, तो इसका असर लेबर पार्टी की चुनावी संभावनाओं और स्वयं बर्नहैम की लोकप्रियता दोनों पर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, ब्रिटेन की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था स्वयं बड़े और त्वरित बदलावों के प्रति बहुत अनुकूल नहीं मानी जाती। राजनीतिक सहमति होने पर भी कई सुधार सरकारी तंत्र के भीतर धीमे पड़ जाते हैं।
निष्कर्ष
एंडी बर्नहैम का प्रधानमंत्री बनना न तो ब्रिटेन की राजनीति में किसी क्रांतिकारी मोड़ का संकेत है और न ही यह पूरी तरह यथास्थिति की निरंतरता है। वे शासन की शैली, प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय विकास की सोच में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाओं की सीमा ब्रिटेन की आर्थिक वास्तविकताओं और संस्थागत ढाँचे से तय होगी।
उनकी सबसे बड़ी चुनौती जनता की अपेक्षाओं का प्रबंधन होगी। एक ऊर्जावान और परिवर्तनकारी नेता के रूप में उनकी छवि लोगों में बड़ी उम्मीदें जगाती है, किंतु मौजूदा परिस्थितियाँ उन उम्मीदों को पूरी तरह साकार करने की अनुमति शायद ही दें। इसलिए अधिक संभावना इसी बात की है कि बर्नहैम के नेतृत्व में ब्रिटेन में क्रमिक संस्थागत सुधार देखने को मिलें, न कि हाल के दशकों की नीतियों से कोई निर्णायक विच्छेद।
(डॉ.अमित धोळकिया वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के विभाग प्रमुख हैं। उन्हें X पर फॉलो करें: @Amit_Dholakia)