हाल ही में संपन्न हुए फीफा विश्व कप में स्पेन ने ख़िताब जीता। १९ जुलाई को हुए फाइनल मुक़ाबले में स्पेन अर्जेंटीना को १-० से हराकर विश्व विजेता बना। इस तरह स्पेन ने २०१० के बाद पहली बार पुरुषों का फुटबॉल विश्व कप अपने नाम किया। पुरुष फुटबॉल विश्व कप के अलावा स्पेन इस वक़्त महिला फीफा विश्व कप का भी चैंपियन है। २०२३ में स्पेन की महिला फुटबॉल टीम ने यह ट्रॉफी जीती है। इसके अगले ही साल २०२४ में स्पेन की पुरुष फुटबॉल टीम ने पेरिस ओलिंपिक गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल किया और यही टीम यूरो कप भी जीती। इसका मतलब है कि इस वक़्त स्पेन की पुरुष और महिला फुटबॉल टीमें सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल टूर्नामेंट की चैंपियन है।
इस विश्व कप की शुरुआत से ही स्पेन को ट्रॉफी जीतने के प्रमुख दावेदारों में से एक माना जाता था। लेकिन स्पेन के पास दूसरी टीमों की तरह कोई बड़े खिलाड़ी नहीं थे। स्पेन का सारा ज़ोर किसी एक या दो खिलाड़ियों पर नहीं बल्कि पूरी टीम पर था। टीमवर्क ही स्पेन की सबसे बड़ी ताक़त साबित हुई जिसकी वजह से स्पेन अंत में विश्व विजेता बना।
टीम में बड़े खिलाड़ी या स्टार खिलाड़ियों का न होने का मतलब यह भी है कि स्पेन के पास अन्य टीमों जैसा ग्लैमर नहीं था। और न ही स्पेन की फुटबॉल खेलने की शैली बहुत आकर्षक है। स्पेन के प्रशिक्षक लुइस दे ला फुएंते ने टीम में व्यक्ति से ऊपर व्यवस्था और प्रक्रिया को रखा। टीमवर्क के साथ साथ स्पेन मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ा। और आज इसके नतीजे सबके सामने हैं।
स्पेन की फुटबॉल टीम की विशेषताएं काफी हद तक एक देश के तौर पर स्पेन का प्रतीक हैं। स्पेन की घरेलू राजनीति हो, विदेश नीति हो या अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में स्पेन की सहभागिता हो, इन सब में एक बात समान है - हर जगह व्यक्ति से ज़्यादा व्यवस्था पर ज़ोर दिया जाता है। इसी वजह से स्पेन अपनी घरेलू राजनीति की तरह विदेश नीति में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है।
स्पेन के इस राजनीतिक दृष्टिकोण का मूल स्पैनिश गृह युद्ध कहा जा सकता है। १९३६ से १९३९ तक चले गृह युद्ध के बाद सैन्य शासक फ्रांसिस्को फ्रांको सत्ता में आए। फ्रांको के सत्ता में आने के बाद स्पेन को एक दशक से ज़्यादा समय तक अंतर्राष्ट्रीय अलगाववाद का सामना करना पड़ा। १९५० के दशक में अमेरिका ने स्पेन के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की और फिर धीरे धीरे स्पेन अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का एक हिस्सा बनता चला गया। सबसे पहले १९५५ में संयुक्त राष्ट्र ने स्पेन को सदस्यता दी। १९८२ में स्पेन नेटो में शामिल हो गया तो १९८६ में स्पेन यूरोपीय संघ से जुड़ा।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय तक अलग थलग रहने की वजह से स्पेन में किसी भी व्यवस्था या संगठन का हिस्सा होने की भावना बहुत मज़बूत है। स्पेन की टीमवर्क के प्रति या एक टीम प्लेयर होने की प्रतिबद्धता यहीं से आती है। अपने हितों की रक्षा करते हुए भी सहयोग को प्राथमिकता देना स्पेन की विदेश नीति का हिस्सा है।
महान स्पैनिश दार्शनिक होसे ओर्तेगा इ गासेत ने कहा था कि अगर स्पेन एक समस्या है तो यूरोप उसका समाधान है। हालांकि ओर्तेगा इ गासेत ने यह बात स्पैनिश गृह युद्ध से भी पहले कही थी। लेकिन इस बात से स्पेन के लोगों में और बुद्धिजीवियों में लोकतंत्र और सहयोग की राजनीति के प्रति जागरूकता दिखती है।
ऐसा नहीं है की स्पेन को कभी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता। पिछले १५ वर्षों में स्पेन को घरेलु स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई चुनौतियों का या मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। स्पेन के घरेलू राजनीति की बात करें तो पिछले एक दशक में हुए आम चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। २०१५ से अभी तक स्पेन में जितनी भी सरकारें बनी वो सभी गठबंधन की सरकारें हैं। वर्तमान की पेद्रो सांचेज़ के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी की सरकार भी अपनी सहयोगी पार्टियों के समर्थन पर चल रही है। लेकिन स्पेन की राजनीतिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी और विपक्ष की पार्टियों की ज़िम्मेदारी निश्चित है। स्पेन के लोकतंत्र की एक ख़ासियत है कि चाहे किसी भी पार्टी की हो लेकिन एक सरकार हमेशा सत्ता में होनी चाहिए और प्रधानमंत्री का पद कभी खाली नहीं होना चाहिए। स्पेन में विपक्ष सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव तभी ला सकता है अगर उसके पास पर्यायी व्यवस्था है और नई सरकार का नेतृत्व करने के लिए कोई नेता है।
शायद यही वजह है की आज दुनिया में और यूरोप में कई आर्थिक चुनौतियां होने के बावजूद स्पेन की अर्थव्यवस्था यूरोप के अन्य बड़े देशों के मुक़ाबले ज़्यादा मज़बूत है और तेज़ी से बढ़ भी रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानि IMF के अनुसार २०२६ में स्पेन की जीडीपी २.०९ % बढ़ने का अनुमान है।
टीम प्लेयर की छवि रखने वाले स्पेन की हाल की राजनीति के बारे में अलग अलग विचार हो सकते हैं। ख़ास कर ईरान युद्ध पर अमेरिका के साथ स्पेन का विवाद शायद स्पेन की सहयोग की नीति के विरुद्ध लग सकता है।
लेकिन अपनी अलग राय रखना स्पेन की दृष्टि से लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल भी है।
(निरंजन मार्जनी विश्व विमर्श के मुख्य संपादक हैं। उन्हें X पर फॉलो करें: @NiranjanMarjani)